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बड़ी बहन का बलिदान: सुंदरपुर नाम के एक छोटे से गाँव में एक बहुत ही प्यारा परिवार रहता था। माता-पिता के गुजर जाने के बाद, घर में सिर्फ दो लोग बचे थे - 15 साल की 'रिया' और उसका 8 साल का छोटा भाई 'अमन'। परिवार (Family) की जिम्मेदारी अब रिया के नन्हे कंधों पर आ गई थी।
रिया बहुत होशियार थी। उसका सपना था कि वह बड़ी होकर डॉक्टर बने और गाँव के लोगों की सेवा करे। वह पढ़ाई में अव्वल आती थी। लेकिन अमन भी पढ़ने में बहुत तेज था और उसका सपना था कि वह एक इंजीनियर बनकर गाँव में बिजली लाए। रिया अपने भाई से बहुत प्यार करती थी और अमन के लिए कुछ भी कर सकती थी।
आर्थिक तंगी और कठिन फैसला
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समय बीतता गया। घर की जमा पूंजी धीरे-धीरे खत्म होने लगी। रिया समझ गई थी कि अब दोनों का स्कूल जाना मुमकिन नहीं है। घर चलाने और अमन की फीस भरने के लिए पैसों की सख्त ज़रूरत थी। रिया के सामने दो रास्ते थे - या तो वह अपनी पढ़ाई जारी रखे और अमन को काम पर लगा दे, या फिर वह अपनी पढ़ाई छोड़ दे और अमन का भविष्य बनाए।
रिया ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपनी किताबों को एक संदूक में बंद कर दिया। अगले दिन उसने अमन से कहा, "अमन, मुझे अब पढ़ाई में मन नहीं लगता। मैं घर पर रहकर सिलाई-कढ़ाई का काम करूँगी। तुम अच्छे से पढ़ाई करना।" अमन छोटा था, उसे नहीं पता था कि यह बड़ी बहन का बलिदान है। वह खुश हो गया कि अब दीदी उसके लिए नए-नए कपड़े बनाएगी।
संघर्ष के दिन
रिया ने गाँव की महिलाओं के कपड़े सिलना शुरू कर दिया। उसकी उंगलियों में सुई चुभती, आँखें दुखतीं, लेकिन वह दिन-रात काम करती रही। वह अपनी कमाई का एक-एक पैसा अमन की फीस और किताबों के लिए जोड़ती। अमन भी अपनी दीदी की मेहनत को बेकार नहीं जाने देना चाहता था। उसने मन लगाकर पढ़ाई की। वह अपनी क्लास में हमेशा फर्स्ट आता था।
रिया अक्सर रात को छिपकर अपनी पुरानी किताबें खोलकर देखती और रोती थी। उसका डॉक्टर बनने का सपना अधुरा रह गया था, लेकिन अमन की मार्कशीट (Marksheet) देखकर उसके सारे गम दूर हो जाते थे। यह भाई-बहन का प्यार ही था जो उसे ताकत देता था।
अमन की सफलता और दीदी का गर्व
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साल बीतते गए। अमन ने शहर के सबसे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। रिया ने अपनी माँ के कंगन बेचकर उसकी कॉलेज की फीस भरी। चार साल बाद, अमन एक सफल इंजीनियर बनकर गाँव लौटा। उसके हाथ में डिग्री थी और आँखों में चमक। उसने रिया के पैर छुए और कहा, "दीदी, यह डिग्री मेरी नहीं, आपकी मेहनत की है।"
अमन ने गाँव में बिजली लाने का प्रोजेक्ट शुरू किया। जब गाँव के हर घर में बल्ब जला, तो सबकी जुबान पर अमन का नाम था। लेकिन अमन जानता था कि इस रोशनी के पीछे उसकी दीदी का वह अंधेरा है जिसमें उन्होंने अपनी जवानी बिता दी।
सच्चाई का खुलासा और उपहार
एक दिन अमन को घर के पुराने संदूक में रिया की किताबें और डायरी मिली। डायरी पढ़कर अमन को पता चला कि दीदी को पढ़ाई कितनी पसंद थी और उन्होंने सिर्फ उसके लिए अपना सपना छोड़ा था। अमन की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे एहसास हुआ कि यह सिर्फ त्याग नहीं, बल्कि एक महान बड़ी बहन का बलिदान था।
अमन ने ठान लिया कि अब वह दीदी के सपने को पूरा करेगा। उसने अपनी पहली तनख्वाह से रिया का दाखिला एक ओपन यूनिवर्सिटी (Open University) में कराया। उसने कहा, "दीदी, आपने मेरे लिए अपना आज कुर्बान किया, अब मैं आपका कल सवारूंगा। आप डॉक्टर नहीं तो क्या, टीचर तो बन सकती हैं। आपकी पढ़ाई फिर से शुरू होगी।"
रिया रो पड़ी। उसने कभी सोचा नहीं था कि उसे दोबारा पढ़ने का मौका मिलेगा। आज उसे लगा कि उसका बलिदान सफल हो गया।
बच्चों, हिंदी नैतिक कहानियां हमें सिखाती हैं कि परिवार के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। प्यार देना ही प्यार पाना है।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
निस्वार्थ प्रेम: सच्चा प्यार वही है जिसमें हम दूसरों की खुशी के लिए अपनी खुशियाँ कुर्बान कर देते हैं।
परिवार का महत्व: मुसीबत के समय परिवार ही सबसे बड़ी ताकत होता है।
बलिदान का फल: अच्छे कर्म और त्याग का फल हमेशा मीठा होता है, जैसे रिया को अंत में खुशी मिली।
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